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Q: .
  • A. केवल A, B, E
  • B. केवल A, B, D
  • C. केवल B, C, D
  • D. केवल B, C,
Correct Answer: Option B - ‘ना़खून क्यों बढ़ते हैं?’ के अनुसार सत्य कथन निम्नलिखित हैं – 1. देवताओं के राजा का वङ्का, जो दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था। 2. नखधर मनुष्य अब एटम-बम पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। 3. एक बूढ़ा कहता था - बाहर नहीं, भीतर की ओर देखो। हिंसा को मन से दूर करो ... • ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ निबन्ध हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘कल्पलता’ (1951 ई.) निबन्ध संग्रह में संकलित है। • यह विचार-प्रधान व्यक्तिनिष्ठ निबन्ध है। • इसमें नाखून का बढ़ना पशुता का प्रतीक है और नाखून का काटना मानवता का प्रतीक माना गया है। • हजारी प्रसाद द्विवेदी ललित निबन्धकार हैं। इन्होंने निबन्ध को व्यक्ति की स्वाधीन चिंता की उपज कहा है। प्रमुख निबन्ध संग्रह – अशोक के फूल (1948 ई.), मध्यकालीन धर्म साधना (1952 ई.), विचार और वितर्क (1957 ई.), कुटज (1964 ई.), आलोक पर्व (1972 ई.) आदि।
B. ‘ना़खून क्यों बढ़ते हैं?’ के अनुसार सत्य कथन निम्नलिखित हैं – 1. देवताओं के राजा का वङ्का, जो दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था। 2. नखधर मनुष्य अब एटम-बम पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। 3. एक बूढ़ा कहता था - बाहर नहीं, भीतर की ओर देखो। हिंसा को मन से दूर करो ... • ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ निबन्ध हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘कल्पलता’ (1951 ई.) निबन्ध संग्रह में संकलित है। • यह विचार-प्रधान व्यक्तिनिष्ठ निबन्ध है। • इसमें नाखून का बढ़ना पशुता का प्रतीक है और नाखून का काटना मानवता का प्रतीक माना गया है। • हजारी प्रसाद द्विवेदी ललित निबन्धकार हैं। इन्होंने निबन्ध को व्यक्ति की स्वाधीन चिंता की उपज कहा है। प्रमुख निबन्ध संग्रह – अशोक के फूल (1948 ई.), मध्यकालीन धर्म साधना (1952 ई.), विचार और वितर्क (1957 ई.), कुटज (1964 ई.), आलोक पर्व (1972 ई.) आदि।

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‘ना़खून क्यों बढ़ते हैं?’ के अनुसार सत्य कथन निम्नलिखित हैं – 1. देवताओं के राजा का वङ्का, जो दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था। 2. नखधर मनुष्य अब एटम-बम पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। 3. एक बूढ़ा कहता था - बाहर नहीं, भीतर की ओर देखो। हिंसा को मन से दूर करो ... • ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ निबन्ध हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘कल्पलता’ (1951 ई.) निबन्ध संग्रह में संकलित है। • यह विचार-प्रधान व्यक्तिनिष्ठ निबन्ध है। • इसमें नाखून का बढ़ना पशुता का प्रतीक है और नाखून का काटना मानवता का प्रतीक माना गया है। • हजारी प्रसाद द्विवेदी ललित निबन्धकार हैं। इन्होंने निबन्ध को व्यक्ति की स्वाधीन चिंता की उपज कहा है। प्रमुख निबन्ध संग्रह – अशोक के फूल (1948 ई.), मध्यकालीन धर्म साधना (1952 ई.), विचार और वितर्क (1957 ई.), कुटज (1964 ई.), आलोक पर्व (1972 ई.) आदि।