search
Q: .
  • A. पहिला अंक
  • B. दूसरा अंक
  • C. तीसरा अंक
  • D. चौथा अंक
Correct Answer: Option B - कोऊ निंह पकरत मेरो हाथ। बीस कोटि सुत होत फिरत मैं हा हा होय अनाथ।। भारत दुर्दशा नाटक में उक्त गीत दूसरा अंक में है। भारत दुर्दशा (1880 ई.) नाटक के लेखक युग प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं। इस नाटक में कुल छ: अंक हैं। यह एक प्रहसन है। इस नाटक के प्रमुख पात्र हैं – भारत, भारत दुर्दैव, भारत भाग्य, योगी, आलस्य, मदिरा एवं सत्यानाशी आदि। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कुल 17 नाटक लिखे हैं। जिसमें 8 मौलिक तथा 9 अनूदित हैं। जो इस प्रकार हैं– मौलिक नाटक — 1. वैदिकी हिंसा - हिंसा न भवति (1873 ई.), 2. विषस्य विषमौषधम (1876 ई.), 3. प्रेम जोगिनी (1875 ई.), 4. चन्द्रावली (1876 ई.), 5. भारत दुर्दशा (1880 ई.), 6. नील देवी (1881 ई.), 7. अंधेर नगरी (1881 ई.), 8. सती प्रताप (1883 ई.)। अनूदित नाटक — 1. रत्नावली (1868 ई.), 2. विद्यासुंदर (1868 ई.), 3. पाखण्ड विडम्बना (1872 ई.), 4. धनंजय विजय (1873 ई.), 5. मुद्राराक्षस (1878 ई.), 6. दुर्लभ बन्धु (1880 ई.), 7. कर्पूर मंजरी (1875 ई.), 8. सत्य हरिश्चन्द्र (1875 ई.) 9. भारत जननी (1877 ई.)।
B. कोऊ निंह पकरत मेरो हाथ। बीस कोटि सुत होत फिरत मैं हा हा होय अनाथ।। भारत दुर्दशा नाटक में उक्त गीत दूसरा अंक में है। भारत दुर्दशा (1880 ई.) नाटक के लेखक युग प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं। इस नाटक में कुल छ: अंक हैं। यह एक प्रहसन है। इस नाटक के प्रमुख पात्र हैं – भारत, भारत दुर्दैव, भारत भाग्य, योगी, आलस्य, मदिरा एवं सत्यानाशी आदि। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कुल 17 नाटक लिखे हैं। जिसमें 8 मौलिक तथा 9 अनूदित हैं। जो इस प्रकार हैं– मौलिक नाटक — 1. वैदिकी हिंसा - हिंसा न भवति (1873 ई.), 2. विषस्य विषमौषधम (1876 ई.), 3. प्रेम जोगिनी (1875 ई.), 4. चन्द्रावली (1876 ई.), 5. भारत दुर्दशा (1880 ई.), 6. नील देवी (1881 ई.), 7. अंधेर नगरी (1881 ई.), 8. सती प्रताप (1883 ई.)। अनूदित नाटक — 1. रत्नावली (1868 ई.), 2. विद्यासुंदर (1868 ई.), 3. पाखण्ड विडम्बना (1872 ई.), 4. धनंजय विजय (1873 ई.), 5. मुद्राराक्षस (1878 ई.), 6. दुर्लभ बन्धु (1880 ई.), 7. कर्पूर मंजरी (1875 ई.), 8. सत्य हरिश्चन्द्र (1875 ई.) 9. भारत जननी (1877 ई.)।

Explanations:

कोऊ निंह पकरत मेरो हाथ। बीस कोटि सुत होत फिरत मैं हा हा होय अनाथ।। भारत दुर्दशा नाटक में उक्त गीत दूसरा अंक में है। भारत दुर्दशा (1880 ई.) नाटक के लेखक युग प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं। इस नाटक में कुल छ: अंक हैं। यह एक प्रहसन है। इस नाटक के प्रमुख पात्र हैं – भारत, भारत दुर्दैव, भारत भाग्य, योगी, आलस्य, मदिरा एवं सत्यानाशी आदि। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कुल 17 नाटक लिखे हैं। जिसमें 8 मौलिक तथा 9 अनूदित हैं। जो इस प्रकार हैं– मौलिक नाटक — 1. वैदिकी हिंसा - हिंसा न भवति (1873 ई.), 2. विषस्य विषमौषधम (1876 ई.), 3. प्रेम जोगिनी (1875 ई.), 4. चन्द्रावली (1876 ई.), 5. भारत दुर्दशा (1880 ई.), 6. नील देवी (1881 ई.), 7. अंधेर नगरी (1881 ई.), 8. सती प्रताप (1883 ई.)। अनूदित नाटक — 1. रत्नावली (1868 ई.), 2. विद्यासुंदर (1868 ई.), 3. पाखण्ड विडम्बना (1872 ई.), 4. धनंजय विजय (1873 ई.), 5. मुद्राराक्षस (1878 ई.), 6. दुर्लभ बन्धु (1880 ई.), 7. कर्पूर मंजरी (1875 ई.), 8. सत्य हरिश्चन्द्र (1875 ई.) 9. भारत जननी (1877 ई.)।