search
Q: .
  • A. संवत् 1950 में कई उत्साही छात्रों के उद्योग से काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई।
  • B. इस सभा की सारी समृद्धि और कीर्ति बाबू श्यामसुन्दर जी के त्याग और सतत परिश्रम का फल है।
  • C. इसके प्रथम सभापति भारतेंदु के फुफेरे भाई बाबू राधा कृष्णदास हुए।
  • D. नागरी प्रचारिणी पत्रिका की प्रारम्भिक संख्याओं को यदि हम निकाल कर देखें तो उसमें अनेक विषयों के लेखों के अतिरिक्त कहीं भी कविताएँ नहीं मिलती।
Correct Answer: Option D - नागरी प्रचारिणी सभा के संदर्भ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का अभिमत नहीं है-नागरी प्रचारिणी पत्रिका की प्रारम्भिक संख्याओं को यदि हम निकाल कर देखें तो उसमें अनेक विषयों के लेखों के अतिरिक्त कहीं भी कविताएँ नहीं मिलती। नागरी प्रचारिणी सभा के संदर्भ में आ. रामचन्द्र शुक्ल का प्रमुख अभिमत इस प्रकार है- ⦁ भारतेन्दु के अस्त होने के उपरांत ज्यों-ज्यों हिंदी गद्य साहित्य की वृद्धि होती गई त्यों-त्यों प्रचार की आवश्यकता भी अधिक दिखायी पड़ती गई। अदालती भाषा उर्दू होने से नवशिक्षितों की अधिक संख्या उर्दू पढ़ने वालों की थी जिससे हिंदी पुस्तकों के प्रकाशन का उत्साह बढ़ने नहीं पाता था। ⦁ अत: संवत् 1950 में कई उत्साही छात्रों के उद्योग से, जिनमें बाबू श्याम सुंदरदास, पं. रामनारायण मिश्र और ठा. शिवकुमार सिंह मुख्य थे, काशी में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। ⦁ इस सभा की सारी समृद्धि और कीर्ति बाबू श्यामसुंदरदास जी के त्याग और सतत् परिश्रम का फल है। वे ही आदि से अंत तक इसके प्राणस्वरूप स्थित होकर बराबर इसे अनेक उद्योग धंधों में तत्पर करते रहे। ⦁ इसके प्रथम सभापति भारतेंदु के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास हुए। इस सभा के दो उद्देश्य थे- नागरी अक्षरों का प्रचार और हिन्दी साहित्य की समृद्धि। ⦁ ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ की प्रारंभिक संख्याओं को यदि हम निकाल कर देखें तो उसमें अनेक विषयों के लेखों के अतिरिक्त कहीं-कहीं ऐसी कविताएँ भी मिल जायेगी जैसी श्रीयुत पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की ‘नागरी तेरी यह दशा!’
D. नागरी प्रचारिणी सभा के संदर्भ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का अभिमत नहीं है-नागरी प्रचारिणी पत्रिका की प्रारम्भिक संख्याओं को यदि हम निकाल कर देखें तो उसमें अनेक विषयों के लेखों के अतिरिक्त कहीं भी कविताएँ नहीं मिलती। नागरी प्रचारिणी सभा के संदर्भ में आ. रामचन्द्र शुक्ल का प्रमुख अभिमत इस प्रकार है- ⦁ भारतेन्दु के अस्त होने के उपरांत ज्यों-ज्यों हिंदी गद्य साहित्य की वृद्धि होती गई त्यों-त्यों प्रचार की आवश्यकता भी अधिक दिखायी पड़ती गई। अदालती भाषा उर्दू होने से नवशिक्षितों की अधिक संख्या उर्दू पढ़ने वालों की थी जिससे हिंदी पुस्तकों के प्रकाशन का उत्साह बढ़ने नहीं पाता था। ⦁ अत: संवत् 1950 में कई उत्साही छात्रों के उद्योग से, जिनमें बाबू श्याम सुंदरदास, पं. रामनारायण मिश्र और ठा. शिवकुमार सिंह मुख्य थे, काशी में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। ⦁ इस सभा की सारी समृद्धि और कीर्ति बाबू श्यामसुंदरदास जी के त्याग और सतत् परिश्रम का फल है। वे ही आदि से अंत तक इसके प्राणस्वरूप स्थित होकर बराबर इसे अनेक उद्योग धंधों में तत्पर करते रहे। ⦁ इसके प्रथम सभापति भारतेंदु के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास हुए। इस सभा के दो उद्देश्य थे- नागरी अक्षरों का प्रचार और हिन्दी साहित्य की समृद्धि। ⦁ ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ की प्रारंभिक संख्याओं को यदि हम निकाल कर देखें तो उसमें अनेक विषयों के लेखों के अतिरिक्त कहीं-कहीं ऐसी कविताएँ भी मिल जायेगी जैसी श्रीयुत पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की ‘नागरी तेरी यह दशा!’

Explanations:

नागरी प्रचारिणी सभा के संदर्भ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का अभिमत नहीं है-नागरी प्रचारिणी पत्रिका की प्रारम्भिक संख्याओं को यदि हम निकाल कर देखें तो उसमें अनेक विषयों के लेखों के अतिरिक्त कहीं भी कविताएँ नहीं मिलती। नागरी प्रचारिणी सभा के संदर्भ में आ. रामचन्द्र शुक्ल का प्रमुख अभिमत इस प्रकार है- ⦁ भारतेन्दु के अस्त होने के उपरांत ज्यों-ज्यों हिंदी गद्य साहित्य की वृद्धि होती गई त्यों-त्यों प्रचार की आवश्यकता भी अधिक दिखायी पड़ती गई। अदालती भाषा उर्दू होने से नवशिक्षितों की अधिक संख्या उर्दू पढ़ने वालों की थी जिससे हिंदी पुस्तकों के प्रकाशन का उत्साह बढ़ने नहीं पाता था। ⦁ अत: संवत् 1950 में कई उत्साही छात्रों के उद्योग से, जिनमें बाबू श्याम सुंदरदास, पं. रामनारायण मिश्र और ठा. शिवकुमार सिंह मुख्य थे, काशी में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। ⦁ इस सभा की सारी समृद्धि और कीर्ति बाबू श्यामसुंदरदास जी के त्याग और सतत् परिश्रम का फल है। वे ही आदि से अंत तक इसके प्राणस्वरूप स्थित होकर बराबर इसे अनेक उद्योग धंधों में तत्पर करते रहे। ⦁ इसके प्रथम सभापति भारतेंदु के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास हुए। इस सभा के दो उद्देश्य थे- नागरी अक्षरों का प्रचार और हिन्दी साहित्य की समृद्धि। ⦁ ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ की प्रारंभिक संख्याओं को यदि हम निकाल कर देखें तो उसमें अनेक विषयों के लेखों के अतिरिक्त कहीं-कहीं ऐसी कविताएँ भी मिल जायेगी जैसी श्रीयुत पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की ‘नागरी तेरी यह दशा!’